उत्तराखंड के ‘घोस्ट विलेज’ पर संसद में चिंता, सांसद अजय भट्ट ने मांगा पुनर्वास के लिए ठोस एक्शन प्लान

नई दिल्ली/देहरादून – पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और नैनीताल-उधम सिंह नगर संसदीय क्षेत्र से सांसद अजय भट्ट ने लोकसभा के शून्य काल के दौरान उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रहे ‘भूतिया गांव’ (घोस्ट विलेज) के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से इन खाली हो चुके गांवों के पुनर्स्थापन के लिए एक नई समग्र योजना तैयार करने की मांग की।
सांसद ने सदन में जानकारी देते हुए कहा कि उत्तराखंड में 1700 से अधिक गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। इन गांवों को ‘घोस्ट विलेज’ कहा जाता है, जहां अब कोई स्थायी आबादी नहीं बची है। उन्होंने बताया कि जनगणना 2011 के अनुसार राज्य में 1048 गांव गैर-आबाद (Non-Inhabited) दर्ज थे, जबकि वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 1700 से अधिक हो चुकी है।
अजय भट्ट ने कहा कि कभी इन गांवों में सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की गूंज रहती थी—त्योहार, शादी-ब्याह, लोकगीत और पारंपरिक गतिविधियां यहां की पहचान थीं। लेकिन आज ये गांव सुनसान हो चुके हैं और कई स्थानों पर जंगली जानवरों का विचरण बढ़ गया है।
उन्होंने पलायन को इस समस्या की मुख्य वजह बताते हुए कहा कि रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। इसके चलते खेती-बाड़ी और ग्रामीण जीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ है।
सांसद ने नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा चलाई जा रही वाइब्रेंट विलेज योजना की सराहना करते हुए कहा कि इससे सीमावर्ती गांवों में विकास और पलायन रोकने में मदद मिल रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों के लिए भी इसी तरह की विशेष योजना की जरूरत है, जहां तेजी से पलायन हो रहा है।
अजय भट्ट ने केंद्र सरकार से मांग की कि इन गांवों को दोबारा बसाने के लिए ठोस नीति बनाई जाए और विशेष आर्थिक पैकेज दिया जाए, ताकि ‘रिवर्स माइग्रेशन’ को बढ़ावा मिल सके और ग्रामीण क्षेत्रों में फिर से जीवन लौट सके।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के गांवों को बचाना न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह क्षेत्र सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक संतुलन का अहम हिस्सा है।





