Haldwani।जिला विकास प्राधिकरण की कार्यशैली पर उठते सवाल, शारदा मार्केट से खानचन मार्केट तक कई मामलों में पारदर्शिता पर सवालिया निशान, पढ़िए हमारी यह स्पेशल रिपोर्ट.
क्या नैनीताल जिले में सब कुछ सही चल रहा है?

हल्द्वानी।नैनीताल जिला उत्तराखंड का ऐसा जिला है, जो राज्य गठन के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। हल्द्वानी में प्रदेश और पहाड़ के कई बड़े नेताओं का निवास है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या जिले में सब कुछ वास्तव में उसी तरह व्यवस्थित चल रहा है, जैसा सरकारी कागजों में दिखाई देता है?
सबसे ज्यादा सवाल इन दिनों जिला विकास प्राधिकरण की कार्यशैली को लेकर उठ रहे हैं। नक्शा पास कराने से लेकर निर्माणों पर कार्रवाई और फिर उन्हीं निर्माणों के वैध होने तक के मामलों ने प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्राधिकरण की कार्रवाई को लेकर समय-समय पर जनप्रतिनिधियों और अन्य जिम्मेदार लोगों की नाराजगी भी सामने आती रही है। सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है कि प्राधिकरण की कार्रवाई से लोग परेशान होने की बात करते हैं?
नक्शा पास कराने में आखिर कौन सा ‘फॉर्मूला’ चलता है?
आम लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्राधिकरण में हर काम सिर्फ नियम और कागजों के आधार पर होता है?
लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं हैं कि नक्शा पास कराने से लेकर निर्माण को अनुमति मिलने तक केवल सरकारी फीस ही नहीं, बल्कि कुछ और व्यवस्थाएं भी करनी पड़ती हैं।
इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है, यह जांच का विषय है। लेकिन यदि विभाग पूरी तरह पारदर्शी तरीके से काम कर रहा है तो उसे सामने आकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि नक्शा पास कराने की पूरी प्रक्रिया क्या है और किसी भी तरह की अनौपचारिक मांग की शिकायत पर क्या कार्रवाई होती है?
शारदा मार्केट: जो निर्माण अवैध था, वह बाद में वैध कैसे हो गया?
हल्द्वानी के शारदा मार्केट का मामला लंबे समय तक चर्चा में रहा। यहां निर्माण को प्राधिकरण द्वारा अवैध मानते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। इस पूरे प्रकरण में विभागीय स्तर पर अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी कार्रवाई की बात सामने आई और एक जीई तथा एई को पद से हटाए जाने का मामला भी चर्चा में रहा।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
अगर निर्माण उस समय अवैध था तो बाद में वही निर्माण वैध कैसे हो गया?
और अगर आज वह निर्माण वैध है, तो फिर जिस संपत्ति स्वामी का निर्माण ध्वस्त किया गया, उसके नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या उस समय प्राधिकरण के पास पूरी जानकारी नहीं थी?
क्या जांच में कमी थी?
क्या कार्रवाई जल्दबाजी में की गई?
या फिर बाद में सामने आए दस्तावेजों ने पूरी तस्वीर बदल दी?
इन सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए।
पहले ध्वस्तीकरण, फिर ‘पुराना नक्शा’ बरामद—आखिर यह कैसा सिस्टम?
शारदा मार्केट के मामले से अलग भी ऐसी चर्चाएं सामने आती रही हैं, जहां किसी निर्माण को अवैध बताकर कार्रवाई की जाती है और बाद में अचानक पुराने दस्तावेज या नक्शे सामने आने लगते हैं।
कई बार तो पुराने नक्शों की तारीख इतनी पुरानी बताई जाती है कि सवाल उठना स्वाभाविक है कि जो दस्तावेज दशकों से मौजूद थे, वे कार्रवाई के समय विभाग को क्यों नहीं मिले?
यदि किसी संपत्ति का नक्शा वास्तव में वैध और पुराना है तो कार्रवाई से पहले उसकी जांच क्यों नहीं हुई?
और यदि नक्शा बाद में मिला है तो उसकी प्रमाणिकता की जांच कौन करेगा?
खानचन मार्केट में करीब 50 साल पुरानी इमारत पर तीन मंजिला होटल—सुरक्षा से बड़ा सवाल क्या?
अब हल्द्वानी के खानचन मार्केट का मामला भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
बताया जा रहा है कि करीब 50 वर्ष पुरानी इमारत पर तीन मंजिला होटल का निर्माण किया जा रहा है। इस भूमि को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं—कुछ लोग इसे नजूल भूमि बताते हैं तो कुछ खाम भूमि।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी परिसर में पहले निर्माण कार्य को प्राधिकरण द्वारा सील किए जाने की बात सामने आई थी। लेकिन अब वही निर्माण वैध कैसे हो गया?
आखिर ऐसा क्या बदला कि जिस निर्माण पर कभी सील लगी थी, आज उसी पर निर्माण की अनुमति का रास्ता साफ हो गया?
पुरानी इमारत, कमजोर लिंटर और बड़ा हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन?
यह सवाल सिर्फ नक्शे या जमीन के स्वामित्व का नहीं है। यह सीधे लोगों की जान की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।
करीब पांच दशक पुरानी बताई जा रही इस इमारत पर तीन मंजिला होटल का निर्माण हो रहा है। यदि इमारत की संरचनात्मक स्थिति वास्तव में कमजोर है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि निर्माण की अनुमति देने से पहले उसकी स्ट्रक्चरल सेफ्टी की जांच किस स्तर पर हुई?
किस इंजीनियर ने रिपोर्ट दी?
रिपोर्ट में क्या-क्या पाया गया?
क्या पुरानी इमारत अतिरिक्त मंजिलों का भार सहने की स्थिति में है?
क्या स्ट्रक्चरल ऑडिट कराया गया?
और यदि कराया गया तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए भयावह हादसे के बाद देशभर में पुराने भवनों और अतिरिक्त निर्माण की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। ऐसे में हल्द्वानी में भी प्रशासन को किसी हादसे का इंतजार नहीं करना चाहिए।
दो कर्मचारियों को हटाने से खत्म हो जाएगा मामला?
एक और बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी निर्माण को लेकर विभागीय स्तर पर गलती हुई थी और उसके लिए जीई तथा एई के खिलाफ कार्रवाई की गई, तो क्या केवल कर्मचारियों को हटाना ही पर्याप्त है?
अगर निर्माण वास्तव में अवैध था तो उसे वैध किसने किया?
अगर निर्माण वैध था तो पहले ध्वस्तीकरण किस आधार पर हुआ?
और अगर दोनों कार्रवाई सही थीं तो इनके बीच बदली हुई परिस्थितियों का दस्तावेजी आधार क्या है?
इन सवालों का जवाब सिर्फ कर्मचारियों से नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम से मांगा जाना चाहिए।
‘रिश्तेदारी और दोस्ती नहीं चलती’—तो फिर क्या चलता है?
प्राधिकरण के बारे में आम लोगों के बीच यह धारणा भी चर्चा में रहती है कि यहां रिश्तेदारी या दोस्ती नहीं, बल्कि कुछ और ही चलता है।
वह ‘कुछ और’ आखिर क्या है?
क्या वास्तव में हर फाइल सिर्फ नियमों और दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़ती है?
क्या सभी लोगों के लिए एक समान नियम हैं?
क्या प्रभावशाली लोगों और आम नागरिकों के निर्माण पर समान कार्रवाई होती है?
अगर विभाग के पास इन सवालों के साफ जवाब हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
अब जरूरत है पूरे सिस्टम के ऑडिट की
नैनीताल जिला विकास प्राधिकरण को लेकर उठ रहे सवाल किसी एक अधिकारी, कर्मचारी या एक निर्माण तक सीमित नहीं हैं। मामला इससे कहीं बड़ा है।
जरूरत है कि शारदा मार्केट, खानचन मार्केट और ऐसे अन्य विवादित निर्माणों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। पुराने नक्शों की प्रमाणिकता की जांच हो, ध्वस्तीकरण के आदेशों और बाद में जारी वैधता/अनुमतियों का मिलान किया जाए और यह सार्वजनिक किया जाए कि आखिर किन परिस्थितियों में निर्णय बदले गए।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नक्शा पास हुआ या नहीं।
सवाल यह है कि—
क्या नियम सबके लिए एक हैं?
क्या प्राधिकरण की कार्रवाई वास्तव में पारदर्शी है?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर कल किसी पुराने भवन में हादसा हो गया तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
जनता जवाब चाहती है।




